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Birth of hanumanji

Birth  of  hanumanji :-

हनुमान जी का जन्म :-

पुय्जिक स्थला नाम की एक परम सुंदर अप्सरा थी |वह स्त्री वेश में पृथ्वी पर विचरण करने आया करती थी |एक बार उसने एक ऋषि का उपहाश  कर दिया तो ऋषि ने उसे वानर कुल में पैदा होने के श्राप दे दिया | पुय्जिक स्थला के बहूत क्षमा याचना करने पर ऋषि ने कहा की वानर कुल में पैदा तो तुम्हे होना ही होगा किन्तु तुम अपना रूप बदलने में समर्थ होगी ,तुम  जब चाहो तब स्त्री रूप धारण कर सकोगी  |
वह अप्सरा महामनस्वी कुय्जर की पुत्री अय्जना के रूप में पैदा हुई | सुमेरु नाम के अति सुंदर पर्वत पर केशरी नाम का एक शक्तिशाली वानर राज करता था |महामनस्वी कुय्जर ने अपनी पुत्री अय्जना का विवाह केशरी के साथ में कर दिया |दोनों बहूत वर्षो तक सुख्पुवक रहते रहे किन्तु उनके कोई संतान नहीं  हुई |पुत्र प्राप्ति के लिए अय्जना पर्वत पर बहूत ही कठोर ताप कर रही थी तभी वह पर मतंगऋषि आये और इतना कठोर तप करने के कारण पूछा |अय्जना ने कहा की पुत्र प्राप्ति के लिए मेने  किशिकंधा  में बहुत तप ,व्रत ,उप्वाश    किये  किन्तु पुत्र की प्राप्ति नहीं हुए अतः
मै यह कठोर तप कर रही हूँ |
तब महामुनि मतंग में कहा पुत्री तुम वृषभाचल  (वेंकटाचल ) पर्वत जा कर के वेंकटेश्वर के चरणों में प्रणाम करो | फिर वह से कुछ ही दूर पर स्थित आकाशगंगा नामक सरोवर में स्नान करो और उसका जल पि कर वायु देव को प्रसन करो |इससे तुम्हे देवता ,राक्षश और मनुष्यों से न पराजित होने वाला तथा अस्त्र क्षस्त्र से भी अवध्य पुत्र होगा |अय्जना ने   वृषभाचल  (वेंकटाचल ) पर्वत जा कर के वेंकटेश्वर के चरणों में प्रणाम करके जल पीया और वायु देव को प्रसन करने के किये तप करने लगी | अय्जना रेशमी पीले रंग की लाल किनारी वाली साडी पहने थी | माता अय्जना तप कर ही रही थी की उनकी साडी का पलू खिसक  गया | उन्हें लगा किसी ने उनको छुआ है | अय्जना का ध्यान भंग हो गया | उन्होंने आँखे खोल कर के देखा कोई नहीं दिखाई दिया | वो बोली कोन है?  कोन है ? सामने  आये नहीं तो मै श्राप देने  वाली हूँ…तभी वायु देव प्रकट  हुए और बोले : क्षमा देवी !क्षमा देवी ! मै वायु देवता हूँ..मै तुम्हारी तपस्या से प्रसन हूँ | मै तुम्हे आशीर्वाद देता हूँ की तुम्हे मेरे से समान पुत्र होगा जो की शक्ति और रफ्तार में मुझ जेसा ही होगा | मै ही तुम्हारे पुत्र के रूप में जन्म लूँगा |
उसी समय अयोध्या में राजा दशरथ वशिष्ट जी के आदेशानुसार महर्षि ऋषयश्रंग के द्वारा पुत्रेष्टि यज्ञ करवा रहे थे |यज्ञ की समाप्ति पर राजा दशरथ के यज्ञ में अग्निकुंड से एक विशालकाय पुरुष प्रकट हुआ , उसके शरीर में अतुल्य प्रकाश था | वह अपने शरीर पर लाल वस्त्र धारण किये था तथा उसके हाथो में तपाये हुए जाम्बूनद नामक सुवर्ण की परात थी जिसका ढकन चांदी का था |उसमे देवताओ को बनाई हुई दिव्य खीर थी |राजा दशरथ ने खीर के दो भाग किये ,एक भाग कैकई को दिया तथा शेष में से दो भाग कर के सुमित्रा और कोशल्या को दे दिया | कैकई कुछ विचार कर रही थी तभी आकाश से एक चील ने झपटा मार कर कैकई के हाथ से वो खीर अपनी चोंच में झपट ली | यह चील ब्रह्म लोक की दिव्य अप्सरा सुवर्चला थी | उसकी कुचेष्टा से कुपित हो कर पितामह ने इसे म्रत्युलोक में चील होने का श्राप दे दिया |जब वह करुण प्रार्थना  करने लगी तो पितामह ब्रह्मा ने कहा की राजा दशरथ के पुत्रेष्टि यज्ञ में प्रजापति पुरुष खीर लेकर प्रकट होगा,राजा दशरथ जब खीर का वितरण करे तब तू कैकई के हिस्से की खीर चोंच में भरकर जहा केशरी की पत्नी अय्जना तपस्या कर रही हो वह जा कर यह खीर गीरा देना तो तू वापिश अप्सरा रूप में ब्रह्म लोक को लोट आएगी |चील ने खीर अय्जना के तपस्या वाली जगह पर गीरा कर ब्रह्म लोक को चली गई |जब खीर चील की चोंच से गीर रही थी तब पवन देव ने वो खीर अय्जना के हाथो में डाल दी और कहा की यह राजा के पुत्रेष्टि यज्ञ की खीर है तुम इससे खा लेना तुम्हे मेरे जेसा पुत्र होगा |
उधर प्रकृति प्रेमी केशरी पुत्र प्राप्ति के लिए विभिन्न धार्मिक स्थलों का भर्मण  कर रहे  थे | एक दिन वह गोकर्ण (गोवा के पास में भगवान शिव का पवित्र स्थान ) में ध्यान कर रहे थे तभी वह एक शम्बसदाना नाम का राक्षश आया और केशरी को परेशान करने लगा | वह वहा रहने वाले ऋषियों को परेशान करता था |दोनों में भयंकर युद्ध हुआ और अंत में राक्षश मारा गया | वहा रहने वाले सभी ऋषियों ने केशरी को आशीर्वाद दिया और शिव का गुप्त दिव्य मंत्र दिया |ऋषियों ने कहा की तुम्हे महाबलवान और अद्भुत कर्म करने वाला पुत्र प्राप्त होगा |
केशरी ने  शिव को प्रसन करने के लिए मंत्र का जप किया और शिव प्रसन हो कर के प्रकट हुए | उन्होंने अपने को उसके पुत्र के रूप ने जन्म लेने का आशीर्वाद दिया तभी शिव के दिव्य तेज में से प्रकाश केशरी में प्रविष्ट हुआ |शिव अंतर्ध्यान हो गए |जब ऋषियों ने केशरी में तेज देखा तो उन्होंने उसे घर जाने का सुझाव दिया | केशरी घर को चल पड़े |
उसी  समय अय्जना भी वायु देव से आशीर्वाद और खीर ले कर के घर को लौट थी | जब केशरी और अय्जना ने एक दुसरे को देखा तो खुसी से उझल पड़े | उनके मिलन से शिव का तेज अय्जना ने प्रविष्ट हो गया | चैत्र शुक्ल १५ मंगलवार को हनुमान जी अवतरण हुआ |उनमे रूद्र का तेज और वायु की शक्तिया समाहित थी |हनुमान जी वायु के औरस पुत्र और रूद्र के अवतार कहलाते है |

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